(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.257. अध्यायः 257
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति साधनसामग्रीप्रतिपादकव्यासवाक्यानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

व्यास उवाच। 12-257-0x(6263)(75661)
---गन्धान्रसान्नानुरुन्ध्यात्सखं वा
--------कीर्ति च यशश्च नच्छ-।
----- वै प्राचरः पश्यतो ब्राह्मणस्य॥ 12-257-1(75662)
----नधीयीत शुश्रूषुर्ब्रह्मचर्यवान्।
ऋवो यजूंषि सामानि वेदवेदाङ्गपारगः॥ 12-257-2(75663)
ज्ञानी यः सर्वभूतानां सर्ववित्सर्वभूतवित्।
नाकामो म्रियते जातु
------------

इष्टी------श्राप्य क्रतूश्चवाप्तदाक्षणान्।
प्राप्नोति नैव ब्राह्मण्यमविज्ञानात्कथंचन॥ 12-257-4(75665)(75664)
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बियति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा॥ 12-257-5(75666)
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम्।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा॥ 12-257-6(75667)
कामबन्धनमेवेदं नान्यदस्तीह बन्धनम्।
कामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 12-257-7(75668)
कामतो मुच्यमानस्तु धूमाभ्रादिव चन्द्रमाः।
विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण वर्तते॥ 12-257-8(75669)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामः॥ 12-257-9(75670)
क कामकान्तो न तु कामकामः
स वै कामात्स्वर्गमुपैति देही॥ 12-257-10(75671)
वेदस्योपनिपद्दानं दानस्योपनिषद्दमः।
दमस्योपनिपद्दानं दानस्योपनिपत्तपः॥ 12-257-11(75672)
तपसोपनिपत्त्यागस्त्यागस्योपनिपत्सुखम्।
सुखस्योपनिपत्स्वर्गः स्वर्गस्योपनिपच्छमः॥ 12-257-12(75673)
क्लेदनं शोकमनसोः संतीर्णं तृष्णया सह।
सत्वमृच्छति संतोपाच्छान्तिलक्षणमुत्तमम्॥ 12-257-13(75674)
विशोको निर्ममः शांतः प्रशांतात्माऽत्मविच्छुचिः।
पङ्गिर्लक्षणवानेतैः समग्रः पुनरेष्यति॥ 12-257-14(75675)
पङ्भिः सत्वगुणोपेतैः प्राज्ञैरधिगतं त्रिभिः।
ये विदुः प्रत्यगात्मानमिहस्थानमृतान्विदुः॥ 12-257-15(75676)
अकृत्रिममसंहार्यं प्राकृतं निरुपस्कृतम्।
अध्यात्मवित्कृतप्रज्ञः सुखमव्ययमश्नुते॥ 12-257-16(75677)
निष्प्रचारं मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः।
यामयं लभते तुष्टिं सा न शक्याऽऽत्मनोन्यथा॥ 12-257-17(75678)
येन तृप्यत्यभुञ्जानो येन तृप्यत्यवित्तवान्।
येनास्नेहो बलं धत्ते यस्तं वेद स वेदवित्॥ 12-257-18(75679)
असङ्गो ह्यात्मनो द्वाराण्यपिधाय विचिन्तयन्।
यो ह्यास्ते ब्राह्मणः शिष्टः स आत्मरतिरुच्यते॥ 12-257-19(75680)
समाहितं परे तत्त्वे क्षीणकाममवस्थितम्।
सर्वतः सुखमन्वेति वपुश्चान्द्रमसं यथा॥ 12-257-20(75681)
अविशेषाणि भूतानि गुणांश्च जहतो मुनेः।
सुखेनापोह्यते दुःखं भास्करेण तमो यथा॥ 12-257-21(75682)
तमतिक्रान्तकर्माणमतिक्रान्तगुणक्षयम्।
ब्राह्मणं विपयाश्लिष्टं जरामृत्यू न विन्दतः॥ 12-257-22(75683)
स यदा सर्वतो मुक्तः समः पर्यवतिष्ठते।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च शरीरस्थोऽतिवर्तते॥ 12-257-23(75684)
कारणं परमं प्राप्य अतिक्रान्तस्य कार्यताम्।
पुनरावर्तनं नास्ति संप्राप्तस्य परात्परम्॥ ॥ 12-257-24(75685)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 257॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-257-9 सकामकामो नतु कामकामः स वै लोकं स्वर्गमुपैति देहीति ट. ड. पाठः॥ 12-257-16 अध्यात्मसुकूतप्रज्ञमिति ट.ड. पाठः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.